देश एक है तो अब कर भी एक ही चुकाना होगा. एकल टैक्स
लगाने की मांग सालों से चल रही थी. एनडीए सरकार ने अपने तीसरे वर्षगाँठ पर जीएसटी
के ज़रिये अर्थव्यवस्था में ऊष्मा भरने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है. जीएसटी कौंसिल
ने 1200 से ज्यादा वस्तुओं और सेवाओं के लिए टैक्स के चार स्लैब तय किए हैं. संघीय
ढांचे को मजबूत करने की दिशा में यह महत्वपूर्ण घटना विकास भी है.
अरुण जेटली वकील हैं और देश के वित्त मंत्री भी हैं,
इसलिए वह उलझन भरे आंकड़ों को भी सरल करके दिखाने और समझाने की कोशिश करते हैं,
लेकिन क्या लोग जीएसटी के आने बाद वित्त मंत्री से रहम की उम्मीद करें. देश की
जनता फिलहाल आंकड़ों से जूझ रही है.
भारत में टैक्स चोरी रोकने की दिशा में अब तक जितने भी
प्रयास किए गए, वह नाकाफी साबित हुए हैं, अब आगे क्या होगा? क्या इस नई टैक्स
व्यवस्था के आने से इकॉनमी लीक पर आ जाएगी?
हमारे देश में इंस्पेक्टर राज से अंग्रेज़ भी नहीं निबट
पाए.
हिंदुस्तान के आज़ाद होने के बाद यह व्यवस्था और भी
ज्यादा जटिल और दुरूह होती गई. जीएसटी
के बाद भी अगर कर प्रावधान सरल नहीं हुआ तो व्यपारियों की परेशानी बढती
जाएगी, उन्हें बाबुओं का डर भी सताएगा, जो भ्रष्ट व्यवस्था के सबसे बड़े पोषक हैं.
अभी यह साफ़ नहीं है कि 1 जुलाई के बाद से राज्यों की
टैक्स कलेक्शन में भूमिका क्या रहेगी, टैक्स कलेक्शन पर अमल कैसे होगा? अभी टैक्स
इकठ्ठा करने के लिए राज्यों की कितनी ज्यादा भागीदारी होगी, यह तय होना है. जनता
की मुश्किलें घटेंगी या बढेंगी यह देखना भी उतना ही दिलचस्प होगा.
टैक्स स्लैब तय करने की खबर आने के बाद देश के शहरी और
ग्रामीण इलाकों में इस बात की चर्चा तेज़ हो गई है कि क्या महंगा हुआ और क्या
सस्ता, क्योंकि जनता को उम्मीद है कि जीएसटी आने के बाद उपभोक्ताओं को बहुत सी चीज़ें
सस्ती मिलेंगी और मल्टिपल वैट और टैक्स से उनको हमेशा-हमेशा के लिए राहत मिल
जाएगी.
नए प्रावधानों के तहत, आम जनता को कुछ क्षेत्रों में
राहत मिली है. फ़र्ज़ कीजिए अगर आप होटल में 1000 रूपये के कमरे में ठहरते हैं तो
आपका टैक्स माफ़ है.
वित्त मंत्री अरुण जेटली आपकी सेहत का ख्याल तो रख ही
रहे हैं साथ ही आपके पॉकेट की भी उनको फिकर है. वह चाहते हैं कि आप घर पर खाना
बनाएं और खाएं. महंगे रेस्तरां में जायेंगे तो खर्च भी ज्यादा करना होगा.
1 जुलाई के बाद से राज्यों को और केंद्र को तभी फायदा
है जब कर संग्रहण ज्यादा हो, कहीं ऐसा न ही कर संग्रह में पर्याप्त वृद्धि न हो.
बाजार को जीएसटी से बड़ी उम्मीद है, इस वक़्त भारत की
अर्थव्यवस्था 7 फीसद की दर से विकास रही है. शेयर मार्किट के जानकारों की राय है
कि जीएसटी के आने के बाद जीडीपी में 2 फीसद का कम से कम इजाफा देखने को मिलेगा. सरकार
को जीएसटी के आने से बड़ी कंपनियों को टैक्स के जाल में लाने में आसानी रहेगी.
कुछ आशंकाएं भी हैं, पंजाब जैसे बाज़ार में जहां ऑटो
पार्ट्स का अच्छा खासा कारोबार है, व्यापारियों को आशंका है कि टैक्स के दरें 24
से 28 फीसद हो जाने से उनका ज्यादा नुकसान न हो जाए.
लुधियाना का
साइकिल उद्योग भी सकते में है, पहले उन्हें 6 फीसद टैक्स देना होता था, अब वह बढ़कर 12 प्रतिशत हो
जाएगा. प्लाईवुड को 28 प्रतिशत कर के स्लैब में रखा गया है इससे रियल एस्टेट पर
बुरा असर पड़ेगा.
प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी ने पिछले दिनों कहा था कि हवाई सुविधा को आम लोगों के लिए सस्ती की
जाएगी ताकि लुंगी और चप्पल पहनने वाला भी अपना यात्रा कर सकें. लेकिन अब तो हवाई
यात्रा की सेवा दर 9 प्रतिशत से सीधा 15-18 प्रतिशत होने वाला है.
जीएसटी का मकसद
है भारत को एक साझा बाज़ार में तब्दील करना. मूल मुद्दा वही है कि क्या जीएसटी के आने से आपकी जेब
पर कम बोझ पड़ेगा, आमदनी बढ़ जाएगी. अगर जवाब हां है तो हम सही रास्ते पर मिलकर आगे बढ़ें. जीएसटी से बहुत ज्यादा उम्मीद न पाल लें, इसे समय दें,
कम से कम दो साल. यह कोई जिन्न नहीं है, जिसके आने भर से आपकी और हमारी साड़ी
समस्याएं क्षण भर में काफूर हो जाएंगी.

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