Sunday, January 7, 2018

आधार से विश्वास तो हिल ही गया है, अब चाहे लाख सफाई दें!

आपके आधार कार्ड में कोई सेंध लगा रहा है।
इसे रोका जाना चाहिए। 
हर हाल में रोका जाना चाहिए।
यही काम चंडीगढ़ के अख़बार दी ट्रिब्यून में काम कर रही रचना खेहरा कर रही थी।
इस काम के लिए क्या पत्रकार को सजा मिलनी चाहिए?
शायद नहीं।
बिलकुल नहीं।
कतई नहीं।

उस पत्रकार का तो सम्मान होना चाहिए जिसने “आधार” कार्ड में जमा निजी जानकारियों के उजागर होने की आशंकाओं को बेपर्दा किया।
दी ट्रिब्यून अख़बार और उसकी पत्रकार रचना खेहरा ने तो एक बहादुरी भरा काम किया, जिससे करोड़ों लोगों की निजी जानकारी को और अधिक पुख्ता किया जा सकेगा।

आधार कार्ड से जुडी जानकारी लीक हो सकती है, इसकी चिंता आम लोगों में लम्बे समय से है लेकिन इससे जुडी खबर छापने के लिए अख़बार के पत्रकार के खिलाफ कार्यवाही होगी, इसका अंदाजा किसी को नहीं था।

विपक्ष ही नहीं मीडिया संगठन भी इसकी जमकर आलोचना कर रहे हैं. सवाल उठता है कि क्या मीडिया का काम सिर्फ प्रेस रिलीज छापना भर रह गया है, क्या रिपोर्टर को जांचपरक रिपोर्ट करने का हक़ ही नहीं है।
आज कांग्रेस की तरफ से सरकार के इस फैसले की खूब आलोचना हो रही है. कांग्रेस के प्रमुख प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि हर भारतीय को इस नासमझी भरे फैसले की आलोचना करनी चाहिए।
चंडीगढ़ प्रेस क्लब के सदस्य ट्रिब्यून के पत्रकार के खिलाफ दायर किये गए मुकदमें के विरोध में मार्च कर रहा है, यही नहीं देश के बड़े बड़े मीडिया समूह सरकार के इस फैसले के खिलाफ है।

चंडीगढ़ के सीनियर पत्रकार सरबजीत धालीवाल कहते हैं कि डाटा लीक करने वाले अधिकारी के खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिए थी. युआईडीएआई की तरफ से आम लोगों की व्यक्तिगत सूचनाओं को जाहिर किया जाना एक बड़ा अपराध है।

आम लोगों ने अपनी निजी जानकारी सरकार से शेयर की, तभी सरकार ने लोगों को आधार कार्ड इशू किया, लेकिन निजी जानकारी को सरेआम हो जाना एक बड़ा अपराध है।

इस पूरे मामले में चंडीगढ़ से प्रकाशित होने वाले अंग्रेजी अख़बार दी ट्रिब्यून की तरफ से भी आधिकारिक प्रतिक्रिया आ गई है जो इस तरह है.

सवाल यह है कि आपकी जानकारी सरकार के पास रहकर कितनी सुरक्षित है, इस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए, किसी अख़बार या पत्रकार का मुंह बंद करने से समस्या ख़त्म नहीं हो जाता।
  

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