राहुल गाँधी गुजरात में क्या कर रहे हैं, महीने भर से मंदिर-मंदिर
जाकर राहुल गाँधी खुद को हिन्दुवाद के पैरोकार के तौर पर साबित ही तो करना चाह रहे
हैं।
ऐसा लग रहा है कि राहुल गाँधी बीजेपी और कांग्रेस के बीच फर्क को ख़त्म
करना चाह रहे हैं।
गुजरात चुनाव के दौरान इस फर्क को सतही तौर पर कुछ हद तक मिटा भी दिया
गया है।
बीजेपी के रणनीतिकार मानते हैं कि कांग्रेस पार्टी बीजेपी द्वारा बुने
गए जाल में फंस गई है। अब नतीजा यह होगा कि कांग्रेस न तो हिंदूवादी पार्टी बन
सकेगी और न ही गरीब और अल्पसंख्यकों की आवाज़।
आपने वित्त मंत्री अरुण जेटली का बयान भी देखा और पढ़ा, जब उन्होंने
कहा कांग्रेस बेकार ही बीजेपी की क्लोन बनने की कोशिश कर रही है। असली हिंदूवादी
पार्टी तो बीजेपी ही है, कांग्रेस तो नकली है।
इस बयान के क्या मायने निकाले जाएँ।
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| (सोमनाथ मंदिर में पूजा के दौरान राहुल गाँधी ) |
राहुल गाँधी ने दो दर्जन से भी ज्यादा मंदिरों में जाकर मत्थे टेके,
खुद को हिन्दू साबित करने के लिए राहुल ने अपना खून जलाया।
खबर है कि कांग्रेस ने हिंदुत्व की राह बहुत सोच समझकर पकड़ी है
क्योंकि कांग्रेस के अन्दर एक बहुत बड़े खेमे का मानना था कि पार्टी की छवि
“हिन्दू-विरोधी” हो गई है।
कांग्रेस गुजरात में एक ऐसे पार्टी के तौर पर सामने आई है जिसने अपने
आप को “सॉफ्ट-हिंदुत्व” के पैरोकार के तौर पर बहुत ज्यादा प्रचारित और प्रसारित कर
रही है।
हालाँकि, कांग्रेस के अन्दर इस रणनीति का लगातार विरोध भी रहा है।
बीजेपी से मुकाबला करने का मतलब यह नहीं है कि कांग्रेस पूरी तरह से
बीजेपी का क्लोन बन जाए.
यह बात पी. चिदंबरम ने अपनी किताब “अ व्यू फ्रॉम आउटसाइड” में
सालों पहले लिखी थी।
आज़ादी के बाद 1950 और 60 के दशक में कांग्रेस को एक ऐसी पार्टी के तौर
पर देखा जा रहा था जिसने देश को आज़ादी दिलावाने के लिए कुर्बानियां दी।
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| (नेहरु और इंदिरा ने दी कांग्रेस को मजबूती ) |
70 और 80 के दशक में कांग्रेस ने पाकिस्तान के खिलाफ सफलता पाई और
गरीबी उन्मूलन की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए गए।
1990 के दशक में कांग्रेस सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने
के व्यापक आर्थिक सुधारों की शुरुआत की।
कांग्रेस का आरोप रहा है कि 1990 के दशक में बीजेपी सत्ता में आई और
इसने देश की आर्थिक विकास की गति पटरी से ही उतर दिया।
बीजेपी ने सत्ता में आने के लिए देश भर में हिंदूवादी एजेंडे को आगे
रख अपनी नीतियाँ और कार्यक्रम बनाए।
इस बीच कांग्रेस यूपीए-वन और यूपीए-टू के सत्ता में रहते-रहते गरीबों
और दलितों से दूर होती गई, कांग्रेस के लिए यह ज़रूरी था कि वह देश के गरीब और
सुविधाविहीन लोगों के लिए योजनाएं लेकर आए।
लेकिन गुजरात चुनाव में तो एक तरह से कांग्रेस ने अपने डीएनए को शरीर
से बाहर निकाल फेंका और जनेऊ पहन कर राहुल खुद को हिन्दू हिन्दू कहने लगे.
गुजरात चुनाव के नतीजे जो भी हों, यह तो तय हो जाएगा कि कांग्रेस आगे
किस राह चलने वाली है।


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