Wednesday, January 17, 2018

आखिर डॉक्टर प्रवीण तोगड़िया से किसको खतरा हो सकता है? सोचिये ज़रा...


विशव हिन्दू परिषद् के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया पिछली रात गायब हो गए. आज जब वह वापस आए तो उनकी आँखों में आंसू थे, जुबान पर पूरी जहाँ को बताने के लिए दुखभरी दास्तान. क्या आपने तोगड़िया को कभी इतना मजबूर देखा था?
आखिर कौन रचेगा तोगड़िया के एनकाउंटर की साजिश?
जितनी लम्बी कहानी है, उतनी ही परतें हैं डॉक्टर तोगड़िया की कहानी में...आखिर कौन हैं प्रवीन भाई तोगड़िया?

कैसे उन्होंने विहिप को गुजरात में इतना मजबूत किया?
मोदी से उनके रिश्ते कैसे थे?
आइये आपको ले चलते हैं 1990 के दशक में..वर्ष 1995, गुजरात में  भाजपा की सरकार बन चुकी थी.
इस दौर में राज्य की राजनीति में प्रवीण तोगड़िया का बड़ा और अहम रोल था। प्रवीण तोगड़िया की सरकार में सुनी भी जाती थी और इनके कहने पर विभाग के मंत्री भी बदल दिए जाते थे।
वह जब अहमदाबाद में होते थे, उनके आगे-पीछे कैमरे होते थे. 1995 से 2002 तक,  गुजरात और केंद्र दोनों जगह भाजपा की सरकारें थीं, यह हिन्दुतत्व का प्रचार करने का एक सही समय भी था. विश्व हिन्दू परिषद् के नेता प्रवीण तोगड़िया मोर्चे पर सबसे आगे नजर आते थे.
तोगड़िया गुजराती लहजे में हिंदी में उत्तेजित करने वाला भाषण देते..एक छोटा सा त्रिशूल उनकी जेब में होता, जिसे वह अक्सर अपनी सभाओं में बंटवाया करते थे।

तोगड़िया का मानना था कि हिन्दुओं को शस्त्रधारी होना चाहिए. इनके कार्यक्रमों का हर जगह कड़ा विरोध होता, लेकिन इनकी लोकप्रियता बढती गई । तोगड़िया, MBBS स्नातक हैं और इसके पश्चात इन्होंने कैंसर विशेषज्ञ के रूप में पढ़ाई की है
जब तोगड़िया और इनकी संस्था विश्व हिंदू परिषद पर  2002 के दौरान गुजरात दंगों में हिंसा फैलाने के आरोप लगे. इनके कई साथियों को सजा हुई.
तोगड़िया की कट्टरवादी छवि को समझने के लिये थोड़ा पीछे चलते हैं, तोगड़िया और नरेंद्र मोदी दोनों अहमदबाद शहर के मणिनगर स्थिति आरएसएस की मुख्य शाखा में अग्रसर होकर हिस्सा लेते थे।
शुरु में ही, 1983 में तोगड़िया विश्व हिंदू में शामिल हुए, वहीँ मोदी 1984 में आरएसएस प्रचारक से हटकर भाजपा में आ गए.
तोगड़िया ओर मोदी, दोनों साथ मिलकर पूरे गुजरात प्रांत में हिदुत्व और भाजपा का प्रचार किया। दोनों एक दुसरे के सहयोगी रहे.
अगर भाजपा की गुजरात में सरकार बनी तो इसके पीछे, मोदी ओर तोगड़िया जैसे सेंकडों कार्यकर्ताओं की मिहनत का यह प्रतिफल था.
लेकिन समय ने पलटा खाया, मोदी को गुजरात की राजनीति से वनवास मिल गया.
गुजरात भाजपा में मोदी को ज्यादा लोग पसंद नहीं करते थे. लेकिन इन दिनों तोगड़िया ओर केशु भाई पटेल राजनीतिक तौर पर करीब आ गए.
खैर राजनीति ने करवट ली, 2001 में मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने. तोगड़िया ने अपने खास कहे जाने वाले गोरधन झड़पिया को मोदी के कैबिनेट में गृह मंग्त्री बनवा दिया, इन पर 2002 के दंगों के दौरान, हिंदू भीड़ के प्रति नरमी बरतने का आरोप है.
प्रवीण तोगड़िया ने भाजपा 100 से ज़्यादा रैलियां की..एक बार तोगड़िया ने कहा था कि घोड़े की सवारी नरेन्द्र भाई कर रहे हैं लेकिन लगाम तो उनके हाथ में है.
मोदी ने यह सन्देश दे दिया था कि वह अपनी सरकार अपने हिसाब से चलाएंगे, तोगड़िया का सरकार में हस्तक्षेप उन्हें मंजूर नहीं था.
तोगड़िया मोदी के विरोध में खड़े हुए नज़र आने लगे।
हर वक्त तोगड़िया, आम सभाओं में, सड़क पर खुलकर मोदी जी का विरोध कर रहे थे।
इधर मोदी का कद बढ़ता गया, लेकिन तोगड़िया को अख़बारों में सुर्खियाँ मिलनी बंद हो गयीं.
शायद तोगड़िया जी के राजनीतिक जीवन का अब अंत आ गया है.

इस घटना के बाद विहिप के कार्यकर्ता डॉक्टर प्रवीण तोगड़िया के लिए खड़े हो रहे हैं लेकिन इनके राजनीतिक जीवन पर फिलहाल एक प्रश्नचिन्ह लग गया है.

Sunday, January 7, 2018

आधार से विश्वास तो हिल ही गया है, अब चाहे लाख सफाई दें!

आपके आधार कार्ड में कोई सेंध लगा रहा है।
इसे रोका जाना चाहिए। 
हर हाल में रोका जाना चाहिए।
यही काम चंडीगढ़ के अख़बार दी ट्रिब्यून में काम कर रही रचना खेहरा कर रही थी।
इस काम के लिए क्या पत्रकार को सजा मिलनी चाहिए?
शायद नहीं।
बिलकुल नहीं।
कतई नहीं।

उस पत्रकार का तो सम्मान होना चाहिए जिसने “आधार” कार्ड में जमा निजी जानकारियों के उजागर होने की आशंकाओं को बेपर्दा किया।
दी ट्रिब्यून अख़बार और उसकी पत्रकार रचना खेहरा ने तो एक बहादुरी भरा काम किया, जिससे करोड़ों लोगों की निजी जानकारी को और अधिक पुख्ता किया जा सकेगा।

आधार कार्ड से जुडी जानकारी लीक हो सकती है, इसकी चिंता आम लोगों में लम्बे समय से है लेकिन इससे जुडी खबर छापने के लिए अख़बार के पत्रकार के खिलाफ कार्यवाही होगी, इसका अंदाजा किसी को नहीं था।

विपक्ष ही नहीं मीडिया संगठन भी इसकी जमकर आलोचना कर रहे हैं. सवाल उठता है कि क्या मीडिया का काम सिर्फ प्रेस रिलीज छापना भर रह गया है, क्या रिपोर्टर को जांचपरक रिपोर्ट करने का हक़ ही नहीं है।
आज कांग्रेस की तरफ से सरकार के इस फैसले की खूब आलोचना हो रही है. कांग्रेस के प्रमुख प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि हर भारतीय को इस नासमझी भरे फैसले की आलोचना करनी चाहिए।
चंडीगढ़ प्रेस क्लब के सदस्य ट्रिब्यून के पत्रकार के खिलाफ दायर किये गए मुकदमें के विरोध में मार्च कर रहा है, यही नहीं देश के बड़े बड़े मीडिया समूह सरकार के इस फैसले के खिलाफ है।

चंडीगढ़ के सीनियर पत्रकार सरबजीत धालीवाल कहते हैं कि डाटा लीक करने वाले अधिकारी के खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिए थी. युआईडीएआई की तरफ से आम लोगों की व्यक्तिगत सूचनाओं को जाहिर किया जाना एक बड़ा अपराध है।

आम लोगों ने अपनी निजी जानकारी सरकार से शेयर की, तभी सरकार ने लोगों को आधार कार्ड इशू किया, लेकिन निजी जानकारी को सरेआम हो जाना एक बड़ा अपराध है।

इस पूरे मामले में चंडीगढ़ से प्रकाशित होने वाले अंग्रेजी अख़बार दी ट्रिब्यून की तरफ से भी आधिकारिक प्रतिक्रिया आ गई है जो इस तरह है.

सवाल यह है कि आपकी जानकारी सरकार के पास रहकर कितनी सुरक्षित है, इस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए, किसी अख़बार या पत्रकार का मुंह बंद करने से समस्या ख़त्म नहीं हो जाता।
  

मोदी को 2019 में हराया भी जा सकता है, कारण जानना ज़रूरी है

      मोदी की लोकप्रियता में एक साल में कमी आई है , इस सवाल का जवाब न तो पहले आसान था न ही आज आसान है। अगर चुनाव...